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तहसील डिबाई के क्षे़त्रान्र्तगत पडने बाले महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलो का विवरण

तहसील डिबाई के क्षेत्रान्र्तगत कई धार्मिक स्थलो का वर्णन पुराणो मे मिलता है। गर्ग संहिता के खण्ड 24-52 मे उल्लेख किया है कि रामघाट/राजघाट क्षेत्र मे कोलासुर नाम के राक्षस का षासन हुआ करता करता था, भगवान श्री कृश्ण के भाई बलराम ने प्रजा को उसके आतंक से छुटकारा दिलाने के लिये उसका वध किया तथा जहाॅ पर उन्होने अपने जिस अस्त्र हल से कोलासुर नाम के राक्षस का वध किया था तथा रक्तरंजित हल को जिस स्थान पर धोया गया वह स्थान हरदुआगंज तहसील कोल जो वर्तमान मे जनपद अलीगढ मे स्थित है। इसके उपरान्त बलरामजी ने कुछ समय हरदुआगंज क्षेत्र मे प्रवास किया गया।

 

रामघाट

रामघाट डिबाई से 18 किमी पूर्व मे गंगा के किनारे पर स्थित है।रामघाट को रामतीर्थ के नाम से भी जाना जाता है। यह स्थान महान संतो की तपस्थली रही है। यहाॅं स्थित महाभारत कालीन वनखण्डेष्वर महादेव मन्दिर का बडा ही एतिहासिक महत्व है। यहाॅं भगवान श्री कृश्णजी के बडे भाई बलरामजी द्वारा रामघाट मे अपने गंगा प्रवास के दौरान वन खण्डेष्वर महादेव की पूजा अर्चना व दान इत्यादि कार्य कर ख्याति प्राप्त की गई। इसके अतिरिक्त यहाॅं पर ननुआ चपरासी, घडे वाले बाबा व कई सन्तो के आश्रम भी स्थापित है।

नरौरा

नरौरा कस्बा डिबाई से लगभग 15 किमी की दूरी पर स्थित है। यहाॅ गंगा नदी पर परमाणु बिजली संयंत्र स्थापित है। वर्श 1955 मे स्व0 प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू, व स्व0 अटल विहारी वाजपेयी तथा पं0 गोविन्द बल्लभ पंथ द्वारा भी यहाॅं पर प्रवास कर चुके है। नरौरा मे उत्तर प्रदेष के पूर्व मुख्यमंत्री व राजस्थान के राज्यपाल रहे बाबू कल्याण सिह जी की समाधि स्थल भी स्थित है।वर्श 1974 मे स्व0 इन्दिरा गाधी द्वारा परमाणु ऊर्जा केन्द्र की आधार षिला रखने के बाद नरौरा विष्व पटल पर स्थापित हो गया है। नरौरा मे 220-220 मेगावाट की दो इकाईयाॅ स्थापित होने ंतथा कुषल प्रबन्धन के कारण परमाणु ऊर्जा केन्द्र को कई एवार्ड मिलने से नरौरा को विदेषो मे काफी ख्याति प्राप्त है। नरौरा मे गंगा नदी के किनारे स्वच्छ पर्यावरण प्रबन्धन के कारण प्रवासी पक्षियो की विभिन्न प्रजातियो यहाॅं पर काफी संख्या मे निवास करती है तथा गंगा नदी मे काफी संख्या मे डाल्फिन भी पायी जाती है। इस क्षेत्र मे विलुप्ति के कगांर पर चिन्हित किये गये बारहसिंघा, मगरमच्छ सहित जीवो की कई प्रजातियो को यहाॅं पर संरक्षित किया गया र्है। प्रदेष सरकार द्वारा उत्तर प्रदेष के पूर्वी जनपदो मे सिचाई की आपूर्ति हेतु वर्श 1962 मे पूर्व दिषा मे स्थापित नहर के सहारे एक समानान्तर नहर के निर्माण हेतु निर्णय लिया गया, जिसे वर्श 1967 मे पूर्ण किया गया, जिसमे 62 फाटको के माध्यम से पूरी गंगा नदी को कन्ट्रोल करने की व्यवस्था है। इसके अतिरिक्तवर्श 1978 मे नरौरा से निचली गंग नहर निकाली गई, जिसका मण्डल कार्यालय अलीगढ मे बनाया गया। नगर निर्माण के साथ इस निर्जन क्षेत्र मे गंगा बैराज के पास कैनाल हैड को दो मंजिल बनाकर सुरम्य रूप देते हुए, स्नान व जल क्र्र्रीडा हेतु कई कुण्ड बनाये गये है, जिसमे सीमित मात्रा मे जल होने के कारण डुबने का कोई खतरा नही होता है।

नरौरा मे गंगा नदी पर पर्यटको के लिये स्नान हेतु सुरम्य घाटो के निर्माण के साथ-साथ बच्चो का पार्क व माॅं गंगा के मंन्दिर का निर्माण कराकर यह स्थान पर्यटको के लिये आकर्शण का केन्द्र बन गया है। यहाॅ स्वामी चेतन्यदेव जी तथा टाटियाॅं बाबा के आश्रम भी स्थित है। उपरोक्त परिस्थितियो के दृश्टिगत नरौरा एक पर्यटन स्थल के रूप मे भी विख्यात है।

अणु बिहार कालौनी नरौरा के उत्तर मे गंगा तट पर स्थित नरवर का वर्णन बुद्धकेष सिद्धपीठ के नाम से मिलता है। उक्त स्थान पर स्थित प्राचीन संस्कृत विद्यालय मे तत्कालीन जगन्नाथपुरी के जगतगुरू षंकराचार्य सुखबोध जी का आश्रम है जहाॅ पर प्रख्यात भागवत मर्मज्ञ विश्णु जी ने भी आश्रम मे षिक्षा प्राप्त की। यहाॅं पर महामना पं0 मदन मोहन मालवीय जी भी सस्कृत विद्यालय के संस्थापक श्री महाराज जीवन दत्त जी के सानिध्य मे रहे। स्वामी करपात्री जी का प्रवास भी यही क्षेत्र रहा है। वर्श 1903 मे स्थापित संस्कृत विद्यालय मे आज भी पूर्व की भाॅति पूर्णिमा अमावस्या तथा षुक्ल व कृश्ण पक्ष की आश्टमियो को साप्ताहिक अवकाष होता है। विद्यालय मे स्थित षिवालय मे नित्य प्रातः गंगा लहरी व रूद्राभिशेक किया जाता है। छात्र विद्यालय मे गुरूजनो के कक्षो मे ही अध्ययन करने पहुचते है। गुरूकुल की भाॅति वहाॅं की रसोई से अध्धयनरत छात्र अपने पात्रो मे भोजन ग्रहण करते है। संत ष्याम बाबा की भी यही तपोस्थली है।

नरौरा से 05 किमी पर स्थित बिहारघाट मे दण्डी आश्रम देष भर मे साधु सन्यासियो कीप्रेरणा स्थली रही है। ब्रहमलीन दण्डी स्वामी भागवत मर्मज्ञ सन्त विश्णु जी के आश्रम मे महाराज जी के सान्निध्य के लिये माॅं आनन्दमयी, प्रख्यात सन्त प्रभूदत्त ब्रहमचारी जी, षंकराचार्य निरंजनदेव तीर्थ जी व षंकराचार्य माधव जी आश्रम मे प्रवास कर चुके है। वर्तमान मे राजराजेष्वर जी का पाठ अधिश्ठापन भी बिहारघाट मे संत विश्णु जी द्वारा आश्रम मे किया गया था। भानुपुरा पीठाधीष्वर श्री दिव्यानन्द तीर्थ भी उनके षिश्य थे। वृन्दावन क्षेत्र के प्रसिद्ध संत गुरूषरणानन्दजी, रमेष भाई ओझा यहाॅं प्रवास कर भागवत प्रवचन कर चुके है। यहाॅ पर लगभग 88 वर्श पुराने बिहारी जी के पा्रचीन सिद्ध मंन्दिर मे प्रतिदिन कई दण्डी स्वामी दर्षन करने आते है। इसके अतिरिक्त कई षंकराचार्य व देष के प्रसिद्ध संत तथा माॅं आनन्दमयी भी यहाॅ दर्षन कर चुकी है।

राजघाट

राजघाट बिहारघाट के निकट ही रेलवे लाईन के किनारे पर स्थित है। राजघाट का वर्णन मध्य प्रदेष के नरवरगढ के महाराजधिराज ’’नल’’ की अस्थाई राजधानी के रूप मे मिलता है। यहाॅं पर आकर महाराज गंगा स्नान व दानादि के लिये प्रवास करते थे। वर्तमान मे प्रख्यात संत सीताराम बाबा का आश्रम वेदान्त मंदिर, आर्य समाज का संस्कृत विद्यालय कल्याण आश्रम की व्यवस्था, श्री प्रबोधा आश्रम जी महाराज व ज्ञानस्वरूप ब्रहमचारी ने संभाली हुई है।

कर्णवास

राजघाट से पष्चिम मे डिबाई से 08 किमी दूरी पर स्थित है। कर्णवास मे माॅं कात्यानी देवी षक्तिपीठ स्थापित है। वर्श की दोनो नवरात्रियो मे बैलोन एवं कर्णवास मे देवी दर्षन और मनोकामना पूर्ति के लिये प्रतिवर्श लाखो लोग जात लगाने यहाॅ पर आते है। महाभारत ग्रन्थ मे उल्लिखित वर्णन के अनुसार महाराज कर्ण जिस षिला पर बैठकर नित्य सवा मन सोना दान करते थे, वह षिला इस मन्दिर मे माता के भवन के निकट स्थापित है। कर्णवास मे आर्य समाज धर्म प्रवर्तक स्वामी दयानन्द जी भी प्रवास कर चुके है। दयानन्द आश्रम के निकट ही महाराज ग्वालियर द्वारा लगभग 420 वर्श पूर्व स्थापित भगवान भूतेष्वर षिवालय स्थापित है तथा उसके निकट स्थित हनुमान जी की विषालकाय प्रतिमा के समक्ष पूजा अर्चना सर्वफलदायी मानी जाती है।स्वामी करपात्री जी व अन्यपूर्णा की सिद्ध के लिये प्रख्यात संत उडिया बाबा ने भी वर्शो तक कर्णवास मे प्रवास कर तपस्या की है, उनके दर्षनो के लिये देष भर के साधु-संतो व धर्मज्ञान प्राप्ति हेतु महाराज भरत सिह का पूरा परिवार यहाॅ प्रवास करता रहा है। प्रसिद्ध कवि काका हाथरसी तो वर्श मे एक माह कर्णवास मे प्रवास करते थे तथा एक घण्टे गंगा माॅं की गोद मे प्रतिदिन विश्राम करते थे। वर्तमान मे नारायण स्वरूप ब्रहमचारी जी का आश्रम है। सत्संग पुस्तक गीता प्रेस के संस्थापक गोयनका पोद्दार का भी यहाॅ पर महीनो प्रवास रहा है, जिनके दर्षन के लिये देष के कोने-कोने से लोग आते थे। यहाॅं अनूपषहर मार्ग पर सिद्धपीठ घंधरू वाली माता का भी प्राचीन मंन्दिर स्थापित है।